जिन्हे दर्शकोंने हमेशा नजरअंदाज किया है उनकी तरफ थोडासा ध्यान खिंचा जाए, यहीं मेरी कोशिश थी...

'कामयाब' फिल्म के लेखक और निर्देशक हार्दिक मेहता से बातचीत 

फोटो सौजन्य: bollywoodirect.com

इस साल मार्च में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘कामयाब’ हाल ही में Netflix इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो गयी है, और भारत समेत दुनियाभर के सिनेमाप्रेमी इस फिल्म को खूब पसंद कर रहे है. यही वजह है की ‘कामयाब’ भारत में नेटफ्लिक्स पर पहले दस सिनेमा में ट्रेंड कर रही है. इस फिल्म में प्रमुख भूमिका में है जानेमाने अभिनेता संजय मिश्रा.  

‘कामयाब’ की कहानी दिलचस्प है. सिनेमा का मुख्य किरदार है 60-65 के सुधीर मिश्रा (संजय मिश्रा). तमाम उम्र फिल्मों में साइड एक्टर का काम करनेवाले सुधीर एक हादसे के वजह से बरसो पहले फिल्म इंडस्ट्री छोड़ देते है. लेकिन एक छोटे रेडियो इंटरव्यू के दरम्यान सुधीर को यह बात पता चलती है की उन्होने अब तक 499  फिल्मो में परफॉर्म किया है, और वो अपनी 500 वी फिल्म से बस एक कदम दूर है. तो बस वो निकल पड़ते है अपना रेकॉर्ड बनाने, 500 वा रोल ढूंढने. अपनी 500 वे परफॉर्मन्स तक पहुँचने की सुधीर मिश्रा की जद्दोजहाद है 'कामयाब' की कहानी. 

सिनेमा की जगमागते दुनिया में सुधीर मिश्रा जैसे नजाने कितनेही कलाकार आपको नजर आने लगते है. संजय मिश्रा की अदाकारी के साथ ही इस सिनेमा का कमाल उसके लेखन और निर्देशन मै भी है. अपनी इस पहली ही फिल्म के चलते चर्चा में आए फिल्म के लेखक - निर्देशक हार्दिक मेहताजी से इस ‘कामयाब’ कहानी के पीछे की कहानी जानना जरुरी लगा 

सवाल: हार्दिक, आपके हिसाब से कामयाब की डेफिनिशन क्या है? और फिल्म का नाम 'कामयाब' रखने के पीछे कोई खास वजह?
- चूँकि हम ये फिल्म 70-80 के दशक के साइड एक्टर्स पे बना रहे थे, तो हम चाहते थे की फिल्म का नाम  भी आपको उस दौर की याद दिलाये और साथ ही वो नाम एक प्यारासा शब्द भी हो, उसका अच्छा मतलब भी हो. वो नाम इंटरेस्टिंग भी हो और लोगों को याद भी रहे. कामयाब इतना अच्छा हिंदी और उर्दू शब्द है, उसमे एक पॉजीटिव्हिटी भी है और थ्रो बैक नॉस्टाल्जिया भी है. 80-90 के दशक में ऐसी फ़िल्में आयी थी जिनका नाम 'कामयाब' हो सकता था. पर 'कामयाब' ये टायटल पहलेसे ही किसीने रजिस्टर किया हुआ था. तो हमने कामयाब के पीछे 'हर किस्से के हिस्से' डाल दिया.

और डेफिनिशन की बात की जाए तो मुझे लगता है, की आजकल कामयाबी की डेफिनिशन काफी हद तक बदल गयी है. सोशल मीडियापर इतने फ़ॉलोवर्स है, इतने लाइक है, यहीं कामयाब होना याने सेलिब्रेटी बनना हो गया है. 

एक 60–65 साल का आदमी जो एक ज़माने में फिल्म इंडस्ट्री में साइड एक्टर था उसके लिए कामयाबी का मतलब क्या होगा? क्योंकी हम कामयाब शब्द जब जब इस्तेमाल करते है तो हम बड़े बड़े सुपरस्टार्स के लिए ही यह लफ्ज़ इस्तेमाल करते है. पर मुझे लगता है, की हर वो इन्सान कामयाब है जिसने अपने-अपने काम में अपना सर्वोच्च दिया है. और हमें इस बात को समझना जरुरी है. बहुत बार हमें लगता है, की 'हाँ वो तो साइड में था ना' . अरे लेकिन उसने अपनी जिंदगी दी है यार उस काम के लिए. 

और क्या कामयाबी सिर्फ प्रोफेशनल कामों में होती है? या पर्सनल भी होती है? आप अगर कहेंगे की, ‘मैंने ऐसे इतने तीस मार खां काम किए है और फिर मै कामयाब हूँ.’ मै यह नहीं मानता. मै अपना काम लगन से कर रहा हूँ और फॅमिली के साथ शाम को बैठे टीव्ही देख रहा हूँ , फ्रूट्स खा रहा हूँ,  वो भी मेरे लिए एक कामयाबी है. कितने प्रोफेशनल्स घरवालों को टाइम नहीं दे पाते है.  आपकी वो प्रोफेशनल कामयाबी किस काम की जब आप पर्सनल लाइफ में कामयाब नहीं हो, वक्त नहीं दे पा रहे हो? तो मेरे लिए ये दिखाना भी जरुरी था की सुधीर जो प्रोफेशनल कामयाबी को पाना चाह रहा है वो कामयाबी शायद उसके लिये बहोत पर्सनल चीज है. 

सवाल: हमें अक्सर फिल्मों में हीरो-हीरोइन को देखने की आदत है, बल्की उन्ही की कहानी देखने के आदी है. पर आपकी कहानी इस सबसे हटकर है. यूँ कहो तो आपने हिरो- हिरोईन के फिल्मों के एक साइड एक्टर को चुना अपनी कहानी बताने के लिए. तो क्या आप फिल्मों की  टिपिकल कहानी को बदलना चाहते हो या फिर आपको हीरो की कल्पना को ही बदलना है? 
- मैंने ऐसा कुछ बदलने का नहीं सोचा है. और क्या ही बदलूंगा! ‘कामयाब’ के साथ रिलीज हुई वही हीरो हीरोइनवाली एक फिल्म उस फिल्म के हीरो के शरीर में जीतनी हड्डिया है उतने थिएटर्स में लगी थी. और एक बूढ़े के सर पे जितने बाल हो उतने थिएटर्स में ‘कामयाब’ लगी थी. तो इतनेसे कुछ बड़ा चेंज तो शायदही आएगा. देखिए, दर्शकोंका ध्यान हमेशा एक ही एक जगह पर जाता है. शायद उन्हें वही दिखाया जाता है इस वजह से भी. आपका ध्यान सोसायटी के हर उस पहलू पे जाये जिससे सोसायटी बनी है, तो यह उतनाही अच्छा रहेगा. हम बस साइड एक्टर्स की बात नहीं कर रहे. वो एक मेटाफर यूज कर रहे है. सोसायटी के लिए बस डॉक्टर, इंजिनिअर जरुरी नहीं होते. प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन भी उतनेही जरुरी होते है. पर हमने कामयाबी की गलत डेफिनिशन बना रखी है. घर में नल ख़राब होता है तो प्लंबरही भगवान् है न? अपने छोटे से छोटे किरदार में अगर कोई अपने पुरे डेडिकेशन के साथ काम कर रहा है तो वो अपने जिंदगी में कामयाब है. 

मेरी बस ये कोशिश थी की दर्शकोंने जिन्हे हमेशा नजरअंदाज किया है उनकी तरफ थोडासा ध्यान खिंचा जाए. ऐसे कई कलाकार है जिन्होंने फिल्मोमें बड़ी डेडिकेशन से काम किया, उनका काफ़ी कॉन्ट्रिब्यूशन है फिल्म इंडस्ट्री में. उन्हे अनदेखा नहीं करना चाहिये बस इतनी ही बात है. 

सवाल: ‘कामयाब’ के मुख्य किरदार सुधीर अपने घरवालोंसे, दोस्तोंसे नॉर्मलसा बात करता है. पर जब कोई इंडस्ट्रीवाला उसे मिले तो वो बेस की आवाज में, थोडा  स्टाइल में बात करता है. तो ये माजरा क्या है?
- अरे, ये अच्छा पकड़ा आपने. दरअसल इस तरह के आवाज में ताब्दिलीवाली बात खुद संजय सर का ही सुझाव था. देखिये, एक किरदार की कहानी से २ घंटे मनोरंजन करना है. जो एक्टर किरदार निभा रहा है उसको भी एक्टिंग करने में मजा आना चाहिए. देखो एक बूढ़ा एक्टर है उसको कोई घास नहीं डाल रहा है. वो खाली बैठा है घरपे. तो वो कैसे बात करेगा? जैसे आम लोग बात करते है. है ना? और जैसे ही किसी डायरेक्टरने या प्रोडक्शन वालों ने फोन किया तो उसके अंदर जो एक वो मिजास है, जो एक पुराना एक्टर है वो जाग जाता है. और वो पुरे स्टाइल में बात करने लगता है. इतने साल इंडस्ट्री में काम किया है और  इतने अलग- अलग एक्टर्स के साथ काम किया है, तो ये बात संजय सर ने ओब्जर्व भी की है. तो its like once an actor always an actor. 

आवाज के साथ ही सुधीर के कपडों और विग को हमने एक सिम्बोलिस्म के तौर पे यूज किया है. 

सवाल: सुधीर के घरके निचे नयी रहने आयी लड़की एक स्ट्रगलिंग एक्टर है. वो कोई आम लड़की भी हो सकती थी. तो स्ट्रगलिंग एक्टर का किरदार लेने की वजह क्या थी? 
- मुझे ये दिखाना था की स्ट्रगल बस बूढ़ोंको नहीं है. जवान लोगोंको भी है. इस लड़की को किसी रिअॅलिटी शो में थोडा बहुत फेम मिल चुका है, वो अपना टैलेंट दिखा चुकी है, जित चुकी है. रियलिटी शोज में अपना टैलेंट दिखा चुके नौजवान 5-6 साल के बाद  कहीं दिखाई भी नहीं देते. ‘हम तुम्हारी जिंदगी बना देंगे, साथमे फिल्म करेंगे...’ शो के जजेस से ऐसे प्रॉमिसेस मिलने के बावजूद आज उनके पास कुछ नहीं होता और वो फिर से ग्राउंड जीरो से स्ट्रगल कर रहे होते है. एक टाइम था जब इनके लिए लाखो लोग वोट कर रहे थे. इसलिए इन यंगस्टर्स के आस्पेक्ट को भी छूना चाहिए ऐसा मुझे लगा. 

और दूसरी वजह ये थी की सुधीर की बेटी फिल्मो में दिलचस्पी नहीं रखती. वो साथ नहीं रहते. पर इस लड़की के साथ वो अपना दुःख-दर्द बाँट सकते है. फिल्मवालों का दर्द फिल्मवालेही समझ सकते है. तो वो लड़की उसकी दोस्त भी है और बेटी भी.

सवाल: ‘कामयाब’ के गाने और उसका संगीत भी कहानी को आगे ले जाता है. संगीत को लेकर कैसा अनुभव था आपका?
- रचिता अरोराने फिल्म का म्युजिक किया है. उसने इसके पहले अनुराग कश्यप सर के साथ 'मुक्काबाज' किया था. 'बहोत हुआ सम्मान' और 'बहोत दुखा मन' ऐसे बढ़िया गाने वो बना चुकी थी. 

क्या होता है की आर्ट फिल्म बनाते वक्त हम ज्यादातर म्युजिक निकाल देते है. पर हम हिंदी फिल्म के एक किरदार की कहानी बता रहे थे, और हिंदी फिल्म का हमारे दर्शकों के साथ जो कनेक्शन है वो म्युजिक से बनता है. हमारे फिल्म में जब किसीका दिल टूटता है तो व्हॉयलिन बजता ही है, है ना?  तो हम म्युजिक को फिल्म का एक किरदार बनाना चाहते थे जो मूड को अंडरलाइन करे. और देखो कामयाब की कहानी एक ही किरदार की है तो वो अकेला खुदसे सब बयाँ नहीं कर सकता, खुदसे बातें नहीं कर सकता. पर उसकी हालात को म्युजिक अच्छी तरह से बयाँ कर सकता है. 

रचिता अलग अलग इंस्टूमेंट्स के लिए ओरिजिनल आर्टिस्ट को बुला बुला के रिकॉर्ड कर रही थी.  ट्रम्पेट के लिए भोईवाड़ा पोलिस स्टेशन के यहाँ से पोलिस बैंड में से एक आर्टिस्ट को बुलाया था. फिल्म के शुरवात में जो गाना आता है 'सद्दियोंसे चलती कहानी' वो बप्पीदा ने गाया है. फिल्म का माहौल रेट्रो है तो बप्पीदा का आवाज तो चाहिए ही था. He is the soul of 80s, 90s . हरिहरनजी ने अपने सिल्क एंड स्मूथ आवाज में एक गाना गाया है 'जिंदगी की गद्दारी से कई सिकंदर हारे है'.  तीन गाने है फिल्म है. बिच में सुधीर के जिंदगी में एक मोड़ आता है और वो नया ताजा फील कर रहा है. तब एक गाना आता है 'पांव भारी हैं ' . ये गाना हमने जानबूझकर ऐश किंग  जैसे  एक युवा गायक से गवाया है. 

लिरिक्स नीरज पांडे और रचिता के है. ये नीरज स्पेशल 26 या बेबी के निर्देशक नहीं है. ये अलग नीरज पांडे है. मेरा दोस्त. और ये नीरज की पहली फिल्म है. आप हिंदी फिल्म बना रहे हो तो म्यूजिक की एहमियत है ही. एक जमाना था की क्रेडिट्स में प्रोड्यूसर के नाम के बाद म्युजिक डिरेक्टर का नाम आता था. और फिर डिरेक्टर का नाम आता था. 

सवाल: ‘कामयाब’ के शुरवात में ही स्पेशल थैंक्स टू शाहरुख़ खान आता है. तो आप एक तरह से साइड एक्टर्स की कहानी बयाँ कर रहे हो और शाहरुख़ खान एक हीरो को रिप्रेजेंट करते है. तो बड़ा आश्चर्य हुआ वो क्रेडिट देखके. तो उसके पीछे क्या सोच है? 
ये आयरनी भी है और ये आयकॉनिक भी है. एक साइड एक्टर की कहानी बताने के लिए आपको एक सुपरस्टार की मदद चाहिए. बहोत कम सुपरस्टार ऐसी फिल्म को सपोर्ट करते हैं जिसमे वो खुद काम नहीं कर रहे है या बहोत कम बजट वाली फिल्म हैं. चूँकि शाहरुख़ खान जी ने ही तो फिल्म रिलीज कराई. वरना हम तो घूम रहे थे फेस्टिवल से फेस्टिवल तक. पर शाहरुख़ खान ने मुंबई फिल्म फेस्टिवल में फिल्म देखी और उन्हें बड़ी पसंद आयी. तो उन्होंने कहा की , 'मै इसे प्रोड्यूस करूँगा, प्रेजेंट करूँगा, रेड चिलीज का नाम लगेगा, हम मार्केटिंग करेंगे, प्रेमियर रखेंगे, पुरे शान से रिलीज करेंगे’. इसीलिए दृश्यम फिल्म ने ये निर्णय लिया की हमें शुरवात में शाहरुख़ खान को शुक्रिया कहना चाहिए. तो वो पहला thank you तो बनता ही है. वरना ये साइड एक्टर की फिल्म इतनी साइड पे रह जाती की शायद हम अभी बात भी नहीं कर रहे होते. 

सवाल: संजयजी ने भी शाहरुख़ के साथ काफी काम किया होगा... 
- हाँ बिलकुल. तो प्रीमियर के समय रातभर सब साथ बैठे थे. संजय सर बता रहे थे की शाहरुख़ के साथ उन्होंने कई फिल्मे एक साथ की और शाहरुख़ की एनर्जी देखने लायक होती थी. और शाहरुख़ खान कह रहे थे की 'अरे हम वही सुपरस्टार वाले रोल करते रहे, पर एक्टिंग तो संजय भाई करते थे. क्यों की उन्हे 'स्टार' का कोई प्रेशर नहीं था तो वो अलग-अलग किरदार कर पाए. ऐसा लग रहा था की वो 90s के किसी सेट पे मिले है.’

सवाल: पहली ही फिल्म इतनी आउट ऑफ़ द बॉक्स बनाई आपने. आपको ये रिस्क नहीं लगा? 
- आउट ऑफ़ द बॉक्स तो नहीं कह सकते. ये सब साइड एक्टर्स हमारे आस पास ही तो रहे है. इनपर अब तक किसने सोचा नहीं, ये प्रॉब्लम है. हाँ ये एक रिस्क था की किसी बड़े हीरो के साथ में फिल्म नहीं बना रहा था. एक वाकया बताना चाहता हुं. में राजकोट से हूँ. में राजकोट गया और लोगों से कहा की, 'फिल्म बना रहा हुं.'
तो उन्होंने पूछा, 'हीरो कौन है?' 
'संजय मिश्रा' 
'कौन संजय मिश्रा?'
'अरे वो है न गोलमाल में आये थे'
'अच्छा पर वो तो साइड में होंगे न? हीरो कौन है?'
'अरे वही हीरो है'
पर ऐसा रिस्क ही तो रिवॉर्ड करता है. मै बच्चनसाब को लेकर ये फिल्म बनाता तो मुझे अभी जो सराहा गया, उतना सराहा नहीं जाता शायद. और फिर शाहरुख़ खान इसे प्रमोट नहीं कर रहे होते. और फिर संजयजी किसी सुपरस्टार से कम है क्या? 

सवाल: आपके लिए 'कामयाब' की कामयाबी किसमे थी? 
- 3 मार्च 2020 का दिन मेरे लिए कामयाबी का दिन था. उस दिन कामयाब का प्रीमियर हुआ. मेरी पत्नी, फॅमिली, मेरे अजीज दोस्त, फिल्म की पूरी टीम , संजय सर की फॅमिली सब आये हुए थे. शाहरुख़ खान भी थे. वो रेड कार्पेटवाला प्रीमियर अँधेरी में रख्खा था. सच ये है की मैं ये फिल्म 2018 में रेडी कर चूका था. 2018 के अक्तूबर में हम कामयाब को कोरिया ले गए फिल्म फेस्टिवल में. ये बिच का डेढ़ साल थोड़ा मुश्किल था. कामयाब रिलीज होगी की नहीं, ये रिलीज होगी तो मेरा काम दिखेगा और फिर मुझे आगे जाके काम मिलेगा, ये सब सवाल आते थे सामने. साऊथ कोरिआ में प्रीमियर होने के बाद व्हॅनकोर,  कॅनडा, टोरंटो, पॅरिस, बारसोलोना, माद्रिद, ये सब दुनिया घूम हम मुंबई फिल्म फेस्टिवल आये. और शाहरुख़ खान ने फिल्म देखी और हमें कामयाबी मिली. तो एक सर्कल पूरी होने का फिलिंग आया. फेस्टिवल में भी घूमे और कमर्शियली भी रिलीज हो ऐसा मौका बहोत कम फिल्मों को मिलता है.

सवाल: आपको अभी तक कामयाब के लिए सबसे बड़ी रिएक्शन कौनसी मिली? 
- 'नीरजा' फिल्म के डायरेक्टर राम माधवानी जी ने मेरा नंबर ढूँढ़के मुझे मेसेज किया. फिल्म की तारीफ की. नसीरुद्दीन शाह जी ने भी कहा की ये यंग डायरेक्टर अच्छा काम कर रहा है. तो ये मेरे लिए बहोत बड़ी बात थी.

मृदगंधा: हार्दिक, जानीमानी अभिनेत्री रत्ना पाठकने 'थप्पड़' के इंटरव्यू के वक्त मुझे कही बात याद आयी. उन्होंने कहा था, “कामयाब जरूर देखना. संजय मिश्रा को क्या खूब रोल मिला है, मेरा तो जी भर आया”. तब रत्ना जी ने आप के काम की बड़ी तारीफ की थी. ये फिल्म देखनेपर मैंने रत्नाजी की बातों की गहराई को महसूस किया. और फिर रत्ना पाठक शाहजी के जरिये ही हमें आपसे बातचीत का मौका मिला. हार्दिक, आपका समय देने के लिए शुक्रिया और ‘कामयाब’ की कामयाबी के लिए आपको बधाई.   

(‘हर किस्से के हिस्से... कामयाब’ का ट्रेलर यहाँ देखें. और अगर Netflix का subscription है तो आप यह फिल्म यहाँ देख सकते है.)

(साक्षात्कार और शब्दांकन: मृदगंधा दीक्षित)

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