शिव का त्रिशूल ही तोड़ने लगे

काशी में विकास के नाम पर फैलती अव्यवस्था और मनमानी

काशी के घाटों और मंदिरों का महत्व जाने बगैर उनको खुर्द-बुर्द करना सनातन की श्रीवृद्धि की बजाय उन्हें मिटाना भर है। जलासाई घाट का काफी हिस्सा काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर में चल गया। जगह संकुचित हो गई तो लगने लगा कि यहां जन सुविधाओं का विकास होना चाहिए। चिताएं आधुनिक बनाई जाएं और शव यात्रियों के लिए विश्रामालय और शौचालय बनाने प्रयास तेज हो गए बिना यह विचारे की इससे घाट का परिदृश्य प्रभावित होगा। शवयात्रियों के जरूरत की बुनियादी सुविधाओं की घाटों पर कमी नहीं थी, जरूरत उनको व्यवस्थित करने की थी। वर्ष 2018-19 के बाद काशी में विकास के नाम पर कारोबारी किस्म की जो मनमानी शुरू हुई उसका ही नतीजा है कि पूरा शहर खंड़हर में तब्दील किया जा रहा है।

तीनों लोगों से न्यारी शिव के त्रिशूल पर बसी प्रकाश स्वरूप काशी आजकल चर्चा के केंद्र में है। विकास के मायने पर हालिया विमर्श की शुरुआत भी मुक्ति केंद्र मणिकर्णिका घाट से हुई है। मणिकर्णिका श्मशान के रूप में लोक ख्यात है। सरकार बच्चों के विकास के लिए काम करने वाली संस्था डोरा फाउंडेशन के कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के धन से यहां अंतिम संस्कार और शवयात्रा में आने वालों के लिए सुविधाएं तैयार की जा रही हैं। इसके लिए कार्यदायी संस्था ने स्थल की गरिमा का ध्यान रखे बगैर उस मढ़ी को जड़ से उखाड़ दिया, जिसका निर्माण महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। मढ़ी पर उनकी मूर्तियां भी थीं, जो टूट गईं। मढ़ी में एक शिवलिंग भी था जो खंडित हो गया। चर्चा की वजह अहिल्या बाई की मूर्ति का खंडित होना बना।  

विवाद के केंद्र में भले ही धार्मिक प्रतीक रखे जाएं लेकिन असल वजह लौकिक ही ज्यादा होते हैं। काशी में सौ से ज्यादा मंदिर और मूर्तियां एक दशक में नष्ट की गईं। विरोध मे स्वर भी उठे लेकिन अहिल्या बाई की मूर्ति और मढ़ी के खंडन के बाद विकास के स्वरूप पर चर्चा छिड़ने का सबब राजमाता अहिल्याबाई की मूर्ति ही बनी।  औरंगजेब ने 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़वा दिया था, जिसको 1780 में अहिल्या बाई होल्कर ने बनवाया। यही मंदिर वर्तमान में है। इस नाते काशी विश्वनाथ के भक्त महारानी अहिल्या बाई को भी आदर देते हैं। मणिकर्णिका घाट का निर्माण पेशवा बाजीराव और अहिल्या बाई ने कराया। अहिल्या बाई ने घाट के किनारे एक मढ़ी बनवाई, जिसकी दीवारों पर उनकी मूर्तियां बनाई गईं। इसे एक पक्ष इसे कलाकृति बताने पर अड़ा था तो दूसरा इसे आस्था का केंद्र। 

काशी में गंगा के घाटों का निर्माण हिंदू राजाओं ने करवाए हैं। काशी नरेश के अलावा दरभंगा, गया, रीवां, होल्कर, सिंधिया, भोसले, गायकवाड़ जैसे तमाम राजाओं ने काशी में घाट और मंदिर बनवाए हैं। दक्षिण भारत के भी तमाम मंदिर और घाट हैं। घाटों पर स्नान करने वाली महिलाओं के वस्त्र बदलने के लिए उनके दोनों तरफ मढ़ियां बनवाईं। इन मढ़ियों में देव प्रतिमाएं और शिवलिंग हैं ताकि महिलाएं उनकी स्नान के बाद तुरंत पूजा कर सकें। कुछ घाटों के किनारे देव प्रतिमाएं इस लिहाज से भी स्थापित की गईं ताकि धर्मभीरु जन घाटों पर गंदगी करने से परहेज करें। इस लिहाजा से घाटों पर बिखरे शिवलिंग और दूसरी देव प्रतिमाएं महत्व रखती हैं और स्नानार्थियों की आस्था के जुड़ी हैं। उनकी नियमित पूजा-अर्चना होती है। काशी के घाट पर बनी किसी प्रतिमा की अवहेलना उस क्षेत्र के लोगों के विचलित कर सकती है।

काशी तीनों लोकों के न्यारी नगरी है। इसकी वजह यह है कि यहां के घाटों पर देश भर की विभिन्न संस्कृतियों के लोगों ने अपना ठिकाना बनाया है। काशी में सारे त्योहार मनाए जाते हैं। देश भर में पूजित सभी विग्रह काशी की आस्था में बसते हैं। स्कंद पुराण के मुताबिक मोक्षानंद स्वरूप कंद के बीज की तरह असंख्य शिवलिंग इस क्षेत्र में बिखरे और भरे पड़े हैं। ये शिवलिंग आत्मा के एक्य के ज्ञान के लक्षण हैं। इसी के चलते शिव ने इसे आनंदकानन नाम दिया। यह अविमुक्त क्षेत्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि प्रलय के समय शिव यहां अविमुक्तेश्वर के रूप में विराजित रहते हैं। 

रूद्रावास, आनंद कानन, महाश्मशान और वाराणसी जैसे तमाम नाम इस शहर के हैँ। इन सब नामों के भौगोलिक या आध्यात्मिक मायने भी हैं। यहां कुछ भी उजाड़ने या बसाने का प्रयास देश के किसी हिस्से की सांस्कृतिक विरासत को उजाड़ना है। कहीं भी तोड़फोड़ बीजरूप में विराजित शिवलिंग के प्रभाव के नष्ट करने जैसा है। आध्यात्मिक चिंतन में मणिकर्णिका का स्थान तो सर्वोच्च है। काशी की सभी यात्राएं यहीं से शुरू होती हैं। स्कंद पुराण तो इसे सृष्टि के विकास की भूमि माननता है। भगवान स्कंद अगस्त्य मुनि को बताते हैं कि प्रलय काल में जब महामहेश्वर ही सर्वत्र व्याप्त थे और कहीं कुछ नहीं था। उनकी सृष्टि की इच्छा हुई तो उन्होंने महाविष्णु का आविर्भाव किया और धर्मपूर्वक सृष्टि के संचालन का दायित्व सौंपा। भगवान विष्णु ने अपने चक्र से एक कुंड का खनन किया। जिस समय चक्रपुष्करिणी निर्मित हुई, उस समय गंगा का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। इसी कुंड के किनारे भगवान विष्णु ने 50 हजार साल तक तप किया। इस तप को देख कर शिव ने अपना मस्तक हिलाया तो उनका मणियुक्त कुंडल चक्रपुष्करिणी में गिर गया। इससे कुंड का नाम मणिकर्णिका पड़ा। मणि से निकली परमज्योति के चलते यह स्थल काशी (प्रकाशवान) कहलाया। महाविष्णु ने शिव से वरदाना मांगा कि जो भी जीव-जंतु और मनुष्य काशी की सेवा करें उन्हें मोक्ष लाभ अवश्य हो और वह अक्षयता को प्राप्त करे। सांख्य योग, आत्मदर्शन, तप, दान, व्रत के बिना ही प्राणियों का कल्याण हो। शिव ने उनको वर दिया कि यहां आत्महत्या और अनशन करके प्राण त्यागने वालों को छोड़कर हर किसी को वर देंगे।

कोई स्थल ईश्वर के अवतारों या दिव्य पुरुषों की कर्मस्थली होने के कारण तीर्थ बन जाता है। पंडित गोपीनाथ कविराज के मुताबिक सभी तीर्थ धमक्षेत्र या कर्मक्षेत्र के रूप में जाने जाते हैं लेकिन काशी ज्ञान क्षेत्र होने के कारण सर्वोच्च स्थान पर है। इस तरह मणिकर्णिका सबसे महत्वपूर्ण और आदि तीर्थ है। इसे शवदाह स्थल के रूप में समझने से सारी गड़बड़ी पैदा हो गई है। मणिकर्णिका घाट पर चक्रपुष्करिणी, विष्णु चरणपादुका स्थल, उनका तप स्थल, आत्मलिंग, भगवान कार्तिकेय का विग्रह, ताड़केश्वर मंदिर जैसे तमाम विग्रह और मंदिर स्थापित हैं। यहां तनिक छेड़छाड़ जोखिम भरा हो सकता है। इस स्थल का संरक्षण ही किया जा सकता है।

मणिकर्णिका को शवदाह स्थल मानना बड़ी भूल है। शवदाह बगल के जलासाई (जलासेन) घाट पर होता रहा है। काशी के घाटों और मंदिरों का महत्व जाने बगैर उनको खुर्द-बुर्द करना सनातन की श्रीवृद्धि की बजाय उन्हें मिटाना भर है। जलासाई घाट का काफी हिस्सा काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर में चल गया। जगह संकुचित हो गई तो लगने लगा कि यहां जन सुविधाओं का विकास होना चाहिए। चिताएं आधुनिक बनाई जाएं और शव यात्रियों के लिए विश्रामालय और शौचालय बनाने प्रयास तेज हो गए बिना यह विचारे की इससे घाट का परिदृश्य प्रभावित होगा। शवयात्रियों के जरूरत की बुनियादी सुविधाओं की घाटों पर कमी नहीं थी, जरूरत उनको व्यवस्थित करने की थी। वर्ष 2018-19 के बाद काशी में विकास के नाम पर कारोबारी किस्म की जो मनमानी शुरू हुई उसका ही नतीजा है कि पूरा शहर खंड़हर में तब्दील किया जा रहा है। आध्यात्मिक प्यास लिए काशी में आने वालों की जगह पर्यटकों को लुभाने का यत्न चल रहा है। इसमें आस्था ही नहीं बल्कि यहां के रोजगार और कारोबार को भी ठेस पहुंचाई जा रही है। कण-कण को कारोबार में बदलने का प्रयास चल रहा है। चरण पादुका स्थल के पुजारी विवेक शुक्ला बताते हैं कि कैलिफोर्निया से कैशी नाम का एक गोरा आया था, उसने महाविष्णु की चरण पादुका और तपस्थली को बेचने का प्रस्ताव दिया था। उसे भगाना पड़ा। इससे जाहिर है कि काशी के घाट और मंदिरों पर कारोबारियों की कुदृष्टि हमेशा से लगी रही है और आज सरकार ऐसे लोगों को अवसर उपलब्ध करा रही है।

मणिकर्णिका और जलासाई घाट के बीच शवयात्रियों की सहूलियत के लिए बृजपाल दास, खत्री, बिड़ला, भिखारी आदि धर्मशालाएं बनी थीं। नागनाथ का अखाड़ा भी था। इस अखाड़े को सतुआ बाबा आश्रम में मिला लिया गया। भिखारी धर्मशाला कॉरिडोर का हिस्सा हो गई। भिखारी धर्मशाला की अपनी ही कथा है। घाट पर मांगने-खाने वाले एक भिक्षुक एक रोज बिड़ला धर्मशाला में शरण लेने गया तो वहां के कर्मचारियों ने उसे अपमानित करके भगा दिया। लीलाधर नामक इस भिखारी ने भिक्षा में मिली राशि से 1941 में इस धर्मशाला का निर्माण कराया था। तब नगर निगम ने इसके लिए जमीन दी थी। 1947 में मणिकर्णिका सेवा ट्रस्ट ने इसका संचालन शुरू किया। वर्ष 2010 में विवादास्पद संत नित्यानंद ने इसे हड़पड़ने का प्रयास किया और 2020 में एक करोड़ 80 लाख रुपये देकर काशी विश्वनाथ धाम में मिला लिया गया। उस समय इसका विरोध हुआ लेकिन 6 जून 2020 को जब देश कोविड के चलते लगे लॉक डाउन में कैद था और सारे कामकाज बंद थे, उस समय कॉरिडोर में मिला दिया गया। उस समय भी साधुओं ने बुल्डोजर के सामने लेटकर विरोध किया था लेकिन उनकी एक न चली। गंगा लाभ भवन भी कॉरिडोर में समाहित हो गया, यहां बुजुर्ग काशीलाभ के लिए निवास करते थे। मजे की बात यह कि आज भी इऩको मणिकर्णिका का हिस्सा दिखाया जा रहा है।

काशी में मंदिरों का विध्वंस कोई नई बात नहीं है। यहां हर युग में कुछ न कुछ परिवर्तन हुए हैं लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर ने इस शहर को उजाड़ने का बीज ही बो दिया है। इसके बाद से लगातार ध्वंस जारी है और इस विध्वंस के पीछे भ्रष्टाचार की भी अपनी कहानी है। काशीनाथ सिंह ने अपने उपन्यास काशी का अस्सी में ग्लोबलाइजेशन के जिस असर को दिखाया है वह आज के क्रॉनी कैपटलिज्म के जमाने में बेहद उग्र हो गया है। 

मान्यता है कि काशी शिव के त्रिशूल पर बसी है। इस वजह से यह नगरी तीन खंडों गौरी-केदारेश्वर, विश्वेश्वर और ओंकारेश्वर में विभाजित है। विश्वेश्वर त्रिशूल के मध्य के फलक पर है। काशी में मुहम्मद गोरी लेकर औरंगजेब तक ने मंदिर तोड़े लेकिन किसी ने इस त्रिशूल को विभाजित करने का प्रयास नहीं किया। आज बीच का विश्वेश्वर खंड श्री काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद बना दिया गया है। केदार और ओंकार खंड को जोड़ने वाली सभी गलियों और घाट को कॉरडोर का हिस्सा बना दिया गया है। नौ मुहल्ले पूर्ण या आंशिक तौर पर मिटा दिए गए। उनमें उनका इतिहास भी चला गया। नीलकंठ, लाहौरी टोला (पंजाबियों का मुहल्ला जहां से काशी में लस्सी का प्रचार हुआ), नेपाली खपड़ा, सरस्वती फाटक, ललिता घाट, खूंटे गणेश और मणिकर्णिका का कुछ हिस्सा कॉरिडोर में शामिल हो गया। इसमें सैकड़ों विग्रहों और शिवलिंगों को तोड़ा गया। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने विरोध किया तो तमाम शिवलिंगों को प्रशासन ने लंका थाने में रखवा दिया, जो आज भी वहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसे भी एआई से बना दृश्य कहेंगे। 

ट्रस्ट से जुड़े स्थलों और मंदिरों की मनमाने तरीके से खऱीद-फरोख्त एक दशक में हुई  है। बल्लभ सालिगराम मेहता अस्पताल की जगह ताज ग्रुप ने होटल बनवा लिया। नाना फड़नविस के बाड़े को भी किसी संस्था को सौंप दिया गया है, जो यहां गेस्ट हाउस बनवाएगी। काशी में इस तरह धर्म की जगह धंधा फैल रहा है।  

मंदिरों और गलियों पर कब्जे के लिए इस इलाके को नगर निगम और वाराणसी विकास प्राधिकरण से मुक्त कर दिया गया। यहां निर्माण और ध्वंस के अपने नियम हैं। ऐसा काम किसी भी मंदिर तोड़ने वाले शासक ने नहीं किया था। राजे-रजवाड़ों ने भी प्राचीन घाटों और गलियों से ऐसी छेड़छाड़ नहीं की। इन खंडों को जोड़ने के लिए एकमात्र रास्ता बचा है। उसे भी विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए बंद कर दिया जाता है। अपनी इस बदअअम्नी पर पर्दा डालने के लिए प्रशासन ने दालमंड़ी की गली को 17 मीटर चौड़ी सड़क में बदलने के लिए तोड़फोड़ कर रहा है। इसके साथ ही रोपवे की योजना के चलते शहर की कई सड़कों पर खंभे खड़े कर दिए गए हैं। इसके लिए गिरजाघर चौराहे से उधम सिंह की प्रतिमा हटा दी गई। प्रशासन जहां से पा रहा है, शहर को ध्वस्त करने की नई योजना के साथ सामने आ जाता है।

काशी महाश्मशान है। इस वजह से नहीं कि यहां मणिकर्णिका पर चिताओं की आग कभी नहीं बुझती बल्कि इस वजह से ही प्रलय काल में भी सबको यहीं रहना है। मत भूलिए कि प्रलय काल में मन, बुद्धि अहंकार, ज्ञाननेंद्रियां, कर्मेंद्रियां, क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर सबको काशी में ही शवरूप में रहना है। यही अविमुक्त क्षेत्र है। जो सर्वत्र दिख रहा है, वह काशी का ही है और जो यहां का नहीं, वह कहीं का नहीं रहता। 

- अजय राय
लेखक उत्तर प्रदेश में पाँच बार विधायक रह चुके हैं व वर्तमान में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के 12वें प्रदेश अध्यक्ष हैं।

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